ध्यान, एक यात्रा है।कोलाहल से शांति की यात्रा। जहां मौन के सिवा और कुछ भी नहीं

लोगों को अकसर सवाल करते हैं। पूछते हैं- ध्यान क्या है, इसे कैसे किया जाए। लेकिन, ध्यान की ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जिनसे आप चौबीस घंटे में कभी गुजरते ना हों। किसी से बात करते हुए, चलते हुए, बैठते हुए, लेटे हुए कभी भी ध्यान किया जा सकता है।

संगीत सुनते हुए कभी – कभी आप खो जाते हैं। कुछ पल के लिए आपको यह आभास ही नहीं होता कि आप संगीत सुन रहे हैं। सुन रहे हैं तो क्या सुन रहे हैं। बस एक ध्वनि है जो कानों में घुल रही होती है लेकिन आप कहीं और जा रहे होते हैं। यही ध्यान है।

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