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नवरात्रि पूजन का भारतीय संस्कृति में अहम स्थान है। इन नौ दिनों में मां शक्ति के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्र का हर दिन एक विशेष देवी को समर्पित होता है। मान्यता है कि रावण की नगरी लंका पर चढ़ाई करने से पहले भगवान राम ने मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की थी। जिसके बाद उन्हें विजयी हासिल हुआ। भक्ति के यह नौ दिन भारतीय संस्कृति और इसके गहरे अध्यात्म की विविधता की झलक देते हैं।

 

नवरात्र के नौ दिन

 

1. नवरात्र के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पर्वतों के राजा हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। इनकी उपासना से सुखी और निरोगी जीवन मिलता है। माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है और इनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है।

वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विंनीम्  ।।

2. नवरात्र की नौ शक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी कठोर तप और ध्यान की देवी मानी जाती हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या, तप का आचरण करने वाली भगवती, जिस कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया है। इनकी उपासना से पुरूषार्थ, अध्यात्मिक सुख और मोक्ष मिलता है। मां के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल है।

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्युत्तमा  ।।

3. माता भगवती के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचन्द्र है, जिस कारण इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है। इनकी उपासना से सभी भय दूर जाते हैं। अपने वाहन सिंह पर सवार मां का यह स्वरूप युद्ध व दुष्टों का नाश करने के लिए तैयार रहता है। मां के दस हाथ हैं जिनमें अलग- अलग तरह के अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं।

पिण्डजाप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता ।
प्रसाद तनुते मह्मं चंद्रघण्टेति विश्रुता  ।।

4. मां दुर्गा का चौथा स्वरूप कूष्माण्डा है। नवरात्र के चौथे दिन आयु, यश, बल व ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली भगवती कूष्माण्डा की पूजा की जाती है। यह भक्तों के जीवन से कलह, शोक का अंत कर लंबी उम्र और सम्मान देती है। हैं। मां कूष्मांडा अष्टभुजा धारी हैं और अस्त्र- शस्त्र के साथ मां के एक हाथ में अमृत कलश भी है।

सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु में  ।।

5. शेर पर सवार मां दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कन्दमाता के रुप में जानी जाती हैं। इनकी उपासना से जीवन में प्रेम, स्नेह और शांति मिलती है। स्कंद माता की चार भुजाएं हैं जिनमें से एक हाथ से मां ने कुमार कार्तिकेय के बालरूप को अपनी गोद में पकड़ा हुआ है और एक हाथ से भक्तों को वरदान देती हुई मुद्रा में हैं। अपने अन्य दो हाथों में मां कमल का फूल लिये हुए हैं।

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्या ।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी  ।।

6. मां कात्यायनी को छठे स्वरूप में जाना जाता है। दुर्गा पूजा के छठे दिन इनकी पूजा से व्यावहारिक जीवन की बाधाएं दूर हो जाती हैं और तन व मन को ऊर्जा मिलती है।

चंद्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ।।

7. नवरात्रि के सातवें दिन मां भगवती के सातवें स्वरूप की विशेष पूजा अर्चना की जाती है जो कालरात्रि के नाम से विख्यात हैं। यह काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। तामसी स्वरूप वाली मां कालरात्रि, अपने भक्तों को काल के बुरे प्रभाव से रक्षा करती हैं और विपरीत हालात में भी लड़ने की शक्ति देती हैं। अपने चार हाथों में खड्ग, लोहे का अस्त्र, अभयमुद्रा और वरमुद्रा किए हुए मां अपने वाहन गर्दभ पर सवार हैं।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता । लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा । वर्धनमूर्ध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी ।।

8. महाष्टमी के दिन महागौरी की पूजा का विशेष विधान है। मां का यह करुणामय रूप है। इनकी पूजा अक्षय सुख देने वाली मानी गई है। महागौरी की चार भुजाएं हैं जिनमें से दो अभयमुद्रा और वरमुद्रा में हैं तथा दो में त्रिशूल और डमरू धारण किया हुआ है। अपने सभी रूपों में से महागौरी, मां दुर्गा का सबसे शांत रूप है। अष्टमी के दिन कन्या पूजन का भी विधान है।

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचि: ।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया ।।

9. मां सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि का आखिरी पड़ाव है। ऐसा माना जाता है कि देवी का यह स्वरूप व्यावहारिक जीवन में ज्ञान, विद्या, कौशल, बल, विचार में पारंगत होने का आशीर्वाद देती हैं। मां सिद्धिदात्री की चार भुजाएं हैं, जिनमें गदा, कमल पुष्प, शंख और चक्र लिये मां कमल के फूल पर आसीन हैं। इनका वाहन सिंह है।

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ।।

 

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