भगवान विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन या वास्तुकला का देवता माना गया है, जिसे मॉडर्न युग में आर्किटेक्ट कहा जाता है। उन्हें विश्व का प्रथम आर्किटेक्ट का दर्जा प्राप्त होने के साथ ही धातु या मशीनों का प्रथम आविष्कारक भी माना जाता है। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार रावण की विशाल और शक्तिशाली सोने की लंका, देवताओं के निवास स्थल स्वर्ग लोक, महाभारत काल का हस्तिनापुर, भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी भी उन्होंने अपने ही हाथों से डिजाइन किया था।

भारत में व्यापार करने वाले बिजनेसमैन से लेकर एक आम आदमी तक विश्वकर्मा पूजन के दिन उनकी पूजा करते हैं। मान्यता है कि उनकी पूजा करने से व्यापार में समृद्धि मिलती है और मशीनों, कल-पुर्जों में नई जान आ जाती है।

विश्वकर्मा कला-कौशल यानी स्किल के देवता हैं। वास्तु शास्त्र के मुताबिक आप अपने स्किल को बेहतर करना चाहते हैं तो संबंधित टूल, औजार वगैरह को घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखें। अगर फैक्ट्री, कंपनी वगैरह में इस तरह का कोई काम होता हो तो कारीगरों को भी दक्षिण-पश्चिम दिशा में बैठाएं। इससे उनकी स्किल में विकास तो होगा ही, आपके लिए भी यह बेहतर गुणवत्ता वाला साबित होगा। खासकर, हस्तशिल्प से जुड़े कारीगरों को तो इसी दिशा में काम करने चाहिए।

फैक्ट्री में बैठने वाले आपके कारीगर अगर उत्तर-पूर्व दिशा में बैठ कर काम कर रहे हैं तो उनका परफॉरमेंस ठीक नहीं होगा। पूर्व-दक्षिण-पूर्व की दिशा में कारीगर काम कर रहे हों तो कारीगरों का काम में मन नहीं लगता और वे भाग जाते हैं। जबकि दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम दिशा में कार्य करने वाले कारीगरों के सामानों में बार-बार खराबी आती रहती है। जो फैक्ट्री मालिकों के लिए बेहद नुकसानदायक साबित हो सकता है।

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