Kamakhya_Guwahati
स्थान: गुवाहाटी, असम
“योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनि कामदा। रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा।।”

कामाख्या मंदिर अपने भीतर कई रहस्य और मायावी संसार को समेटे हुए है। भारत के प्राचीन मंदिरों में शुमार देवी सती का यह मंदिर 51 शक्ति पीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। पुराणों के अनुसार जहां-जहां देवी सती के अंग, धारण किए हुए वस्त्र या आभूषण गिरे, वे देवी के शक्तिपीठ कहलाए। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर देवी सती का पवित्र कौमार्य योनि अंग गिरा था। कामाख्या में मां की कोई मूर्ति नहीं है। इस मंदिर में शक्ति की पूजा महामुद्रा (योनि-कुण्ड) के रूप में होती है। योनि के आकार का एक शिला खण्ड है, जिसके ऊपर लाल रंग के घोल और रक्तवर्ण के वस्त्रों से ढका रहता है।

कामाख्या मंदिर तांत्रिकों के लिए यह सबसे अहम जगह है। कहा जाता है कि तंत्र साधना से जुड़ी आखिरी सिद्धियों की प्राप्ति यहीं पर पूर्ण होती है। पौराणिक कहावत है कि यहां लगने वाले अम्बूवाची पर्व के दौरान मां भगवती रजस्वला होती हैं और मां की पवित्र योनि से तीन दिनों रक्त निकलता रहता है। यह भी कहा जाता है कि इन तीन दिनों में ब्रह्मपुत्र नदी मां की योनि रक्त से लाल हो जाती है। इसलिए इस स्थल को अलौकिक शक्तियां और तंत्र सिद्धि का प्रमुख स्थल माना जाता है।

असम की राजधानी गुवाहाटी से 8 किमी दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित इस मंदिर के प्रसिद्धि के बारे में कई तरह की बातें कही जाती हैं। लेकिन इसका एक मुख्य कारण इस मंदिर का प्राचीन भारतीय वास्तु सम्मत होना भी है। मंदिर का निर्माण लंबाई में हुआ है। इसमें पूर्व से पश्चिम, चार कक्ष बने हैं। जिसमें एक गर्भगृह तथा तीन अन्य कक्ष हैं। इस मंदिर में सात अण्‍डाकार स्‍पायर हैं, जिनमें से प्रत्येक पर तीन सोने के मटके लगे हुए हैं और प्रवेश द्वार सर्पिलाकार है जो एक घुमावदार रास्‍ते से थोड़ी दूर पर खुलता है। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि मंदिर के भीतर दीवारों पर किसी तरह के रंग-चूना का प्रयोग नहीं किया गया है।

मंदिर की प्रसिद्धि और समृद्धि का वास्तुगत कारण
  • मंदिर का प्रवेश द्वार उत्तर ईशान कोण में है। इस मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर उत्तर दिशा में ब्रह्मपुत्र नदी बहती है जो काफी शुभ है।
  • वास्तुशास्त्र के अनुसार किसी भवन के पीछे की ओर ऊँचाई हो, मध्य में भवन हो तथा आगे की ओर जमीन नीची हो या जलकुंड हो तो वह भवन प्रसिद्ध होता है। कामरूप-कामाख्या मंदिर के आर्किटेक्ट को देखें तो ऐसा ही है।
  • मंदिर के उत्तर में एक तालाब है जिसे सौभाग्य कुंड कहते हैं। गर्भ गृह में मां के पवित्र स्थल के पास ही एक जल कुंड भी है। उत्तर में ब्रह्मपुत्र नदी और जल कुंड या तालाब मंदिर को ज्ञान और समृद्धि प्रदान करता है।
  • मंदिर की पश्चिम दिशा में ऊँचाई पर दशनामी अखाड़ा है। उसके आगे पूर्व दिशा की ओर छिन्नमस्ता मंदिर काफी नीचे स्थित है। साथ ही मंदिर का गर्भ गृह भी पश्चिम की तुलना में पूर्व में पहाड़ी की बनावट के कारण काफी नीचा दिखता है।
  • मंदिर के पश्चिम और दक्षिण दिशा का ऊँचा होना मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की इच्छाएं पूरी करने की शक्ति देता है और उन्हें सही दिशा का ज्ञान भी प्रदान करता है।
  • मां की पवित्र महामुद्रा (योनि-कुंड) का मंदिर के दक्षिण-पूर्व दिशा में होना भी बेहद शुभ है जहां वे रक्त के रंगों के कपड़ों से ढंकी रहती हैं। महावास्तु के मुताबिक यहां लाल रंग का होना भी मन मांगी मुरादों पूरी करने में मदद करता है।