ध्यान, एक यात्रा है।कोलाहल से शांति की यात्रा। जहां मौन के सिवा और कुछ भी नहीं

लोगों को अकसर सवाल करते हैं। पूछते हैं- ध्यान क्या है, इसे कैसे किया जाए। लेकिन, ध्यान की ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जिनसे आप चौबीस घंटे में कभी गुजरते ना हों। किसी से बात करते हुए, चलते हुए, बैठते हुए, लेटे हुए कभी भी ध्यान किया जा सकता है।

संगीत सुनते हुए कभी – कभी आप खो जाते हैं। कुछ पल के लिए आपको यह आभास ही नहीं होता कि आप संगीत सुन रहे हैं। सुन रहे हैं तो क्या सुन रहे हैं। बस एक ध्वनि है जो कानों में घुल रही होती है लेकिन आप कहीं और जा रहे होते हैं। यही ध्यान है।

एक टक उड़ते हुए बादलों को देखना, आकाश में उड़ते हुए पंक्षियों को देखना, बहते हुए झरने, कोयल की आवाज, हरे भरे खेत-जंगल-नदी को देखकर हम कहीं और चले जाते हैं। हम वहां नहीं होते, जहां पर हैं। ऐसा अकसर ही होता है कि आप कुछ याद कर रहे होते हैं। पुराना बीता हुआ समय। अपना अतीत या फिर कुछ और जिसका कभी ख्वाब देखा हो आपने। किसी चीज को एक टक देखते-देखते आप कहीं खो जाते हैं। सब कुछ धुंधला होता चला जाता है। आप होश के इलाके से बाहर चले जाते हैं और अनंत आकाश की गहराइयों में गोता लगाने का अहसास होने लगता है। जहां न शरीर का भार है और न ही विचारों का ख्याल। सब कुछ खत्म हो चुका है। और जब हमारी आंखें खुलती हैं तो पता नहीं होता कि हम कहां की यात्रा से वापस आ गए हैं। यही ध्यान है। ध्यान आपको मन के गहरे तलों पर लेकर जाता है- चेतन मन और अवचेतन मन। हम अपनी सारी जिन्दगी चेतन मन में जीते हैं।

दुनिया को सर्वप्रथम योग सूत्र देने वाले महर्षि पतंजलि कहते हैं, आपके मन में बार-बार आने वाले विचारों को जब आप रोक देते हैं या उनसे मुक्त हो जाते हैं तो स्वयं से मिलना होता है। स्वयं से जुड़ना ही योग होता है। स्वयं से मिलना यानी मन में आने वाले बहके हुए विचारों से बाहर हो जाना। यानी, उन चीजों से मुक्त हो जाना। दरअसल, मुक्त हो जाने की कला ही ध्यान है जो योग की अंतिम अवस्था है।

वास्तुशास्त्री खुशदीप बंसल जिन्होंने पतंजलि के योग सूत्रों की व्याख्या की है, कहते हैं कि अंतर्मन में आने वाले विचारों को निरंतर अभ्यास और वैराग्य से रोका जा सकता है। वैराग्य के बारे में पतंजलि ने कहा है कि देखे, सुने हुए विषयों के प्रति मोह छोड़ देने की मनोवस्था ही वैराग्य है। जैसे ही आपने अपने मन में आने वाले विचारों को रोका, आप अनंत आकाश की ओर खुद ब खुद ही किसी नदी की तरह बहते चले जाएंगे। आपके और मन के बीच से ज्यों ही विचारों का पर्दा गिरा, धीरे-धीरे अनंत में लीन हो जाएंगे और यही वह अद्भुत क्षण होता है जब परमात्मा से मिलन होता है। इसलिए महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों को हमेशा जंगलों में जाकर ध्यान करने को कहा करते थे। उन्हें मालूम था कि प्रकृति की शीतलता से भला शिष्य कब तक बचेंगे। एक न एक दिन वे ध्यान को पा ही लेंगे।

ध्यान अगर करना है तो जहां हैं वहीं ठिठक जाएं, भागम-भाग की जिन्दगी से दो पल निकालें, बैठ जाएं, लेट जाएं जहां मौका मिलता हो। घर में हो या किसी पेड़ के नीचे, अपने बगीचे में, नदी, तालाब के किनारे कहीं भी। आंखें बंद कर लें और प्रकृति को सुनें। जो आपको पसंद हो उसका ख्याल करें और करते चले जाएं। धीरे-धीरे आप उससे मुक्त होकर वहां पहुचेंगे जहां न आप का शरीर होगा, न विचार होंगे, न दुनिया होगी...बस एक अनंत आकाश होगा और मौन होगा।