Alchemist Krishna on Panchtattva theory of Karma and Phal

कर्म क्या है? कर्म ही पाप और पुण्य का फल देता है। कर्म ही हमें बांधता है स्वर्ग की लालसा में और कर्म ही हमें  नरक में जाने का डर पैदा करता है। मानसिक द्वंद्व के इस दलदल में लोग फंसे हुए हैं। जैसे रण क्षेत्र में अर्जुन खुद को फंसा हुआ पाता है।

कृष्ण की दृष्टि में कर्म पंचतत्वों का संतुलन है, जो एक तत्व से दूसरे तत्वों में रूपांतरित होता है। एक अलकेमिस्ट ही पांचों तत्त्वों के संतुलन के बारे में बता सकता है, जैसा उन्होंने गीता में कहा है -


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।


कृष्ण आखिर इसमें क्या कह रहे हैं? इस बारे में वास्तुशास्त्री खुशदीप बंसल कहते हैं, ''ज्यादातर लोग गीता के इस खूबसूरत कथन का गलत अर्थ समझते हैं। गलत अर्थ है, 'अपना कार्य करो और फल की उम्मीद छोड़ दो। नहीं, मैं इस खूबसूरत कथन के इस अनुवाद से सहमत नहीं हूं।'' भगवत गीता में कृष्ण के कहे गए इस उल्लेख की व्याख्या करते हुए वास्तुशास्त्री कहते हैं, ''इस भौतिक संसार में कोई भी कर्म किसी न किसी इच्छित परिणाम को सामने रख कर ही किया जा सकता है। श्रीकृष्ण, जो स्वयं ईश्वर हैं, ऐसा अव्यावहारिक उपदेश दे ही नहीं सकते।''


माकर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि


कृष्ण कहते हैं, कर्म के फल के लिए मैं हमेशा कर्म के साथ हूं। वह स्पेस जो संतुलन को बनाए हुए है; उसके लिए मैं यानी कृष्ण हूं। कृष्ण यहां नियंत्रण सिद्धान्त के बारे में बात कर रहें हैं और यह नियंत्रण पंचतत्वों के माध्यम से हो रहा है।

एक अलकेमिस्ट अर्जुन से कह रहा है- तुम यह करो और बाकी सभी कुछ अपने आप होगा। तुम यहां हो उसके पीछे एक प्रयोजन है। तुम्हारे कर्म पहले से तय हैं, परंतु जिस क्षण तुमने फल पर ध्यान केन्द्रित किया, उसी क्षण वह खत्म हो गया। फल के संबंध में कृष्ण कहते हैं ''फलस्वरूप क्या होगा यह मुझ पर छोड़ दो, मुझ पर विश्वास करो क्योंकि वही होगा जो मैं चाहूंगा, लेकिन तुम इस पर ध्यान मत दो।''

वास्तुशास्त्री खुशदीप बंसल कहते हैं, ''यह बात बड़ी महत्वपूर्ण है कि पंचतत्व हमारे कर्म व फल, हमारे निवास स्थान,  जीवन प्रयोजन सभी जगहों पर मौजूद हैं और यही आकाशीय अलकेमी हमारे जीवन को संचालित कर रही है।''